शनिवार, १० ऑक्टोबर, २०२६

शून्य

 शून्य से पैदा हुआ तू

शून्य में मिल जाएगा।

शून्य से शून्य तक को

ज़िंदगी कहलाएगा।


​आदि शून्य अंत शून्य

फिर काहे का घमंड तुझे?

'मैं-मैं' करना छोड़ दे

ज़िंदगी के ले मज़े।


मोह-माया सब खेल है

तू शून्य में ही जी रहा

शून्य में ही बढ़ रहा

तू शून्य में ही पल रहा


​तू बस इसका अंश है

जिसमें वास शून्य का

शून्य को पहचान तू

कर सफ़र मुकाम का

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