शून्य से पैदा हुआ तू
शून्य में मिल जाएगा।
शून्य से शून्य तक को
ज़िंदगी कहलाएगा।
आदि शून्य अंत शून्य
फिर काहे का घमंड तुझे?
'मैं-मैं' करना छोड़ दे
ज़िंदगी के ले मज़े।
मोह-माया सब खेल है
तू शून्य में ही जी रहा
शून्य में ही बढ़ रहा
तू शून्य में ही पल रहा
तू बस इसका अंश है
जिसमें वास शून्य का
शून्य को पहचान तू
कर सफ़र मुकाम का
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